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राजनितिक बतकही

by Akhbar Jagat , Publish date - Jun 19, 2022 12:11PM IST
राजनितिक बतकही

✍️संजय सोनी सप्ताह भर चली कवायद कोर टीम के मंथन एंव आपसी राय मशवरा से तैयार अंतिम सूची में हुए संशोधन के बाद भारतीय जनता पार्टी द्वारा जो प्रत्याशी सूची जारी की गई है। उसकी आम बतकही में नौ की जगह 12 महिला प्रत्याशी पार्षद एवं 6 पुरुष प्रत्याशी होना जहां मातृत्व शक्ति का दबदबा होना बताता है वही प्रत्याशी सूची में चार अनुभवी चेहरे (पूर्व पार्षद) तीन प्रत्याशी चेहरे अनुभवीहीन होकर भी अनुभवी स्वजन चेहरों के साथ हैं। वही एक प्रत्याशी चेहरा अपने पति के हिंदू नेता की पहचान तथा शेष चेहरे ककहरा राजनीति की पहचान लिए हुए हैं। राजनीतिक बतकही में यह प्रत्याशी सूची कांग्रेस के आयाराम विधायक सचिन बिरला के रंग मे सरोबार है । जिसमें दो चेहरे पूर्व कांग्रेसी विचारधारा के होकर तीन चेहरे संघ दबाव के तथा संपूर्ण प्रत्याशी सूची पूर्व विधायक हितेंद्र सिंह सोलंकी के प्रभाव से मुक्त कही जाती है। पार्टी कार्यकर्ताओं से बतकहीं पूर्व अंदेशे मुताबिक सूची जारी होते ही उनके असंतोष को लेकर है। जिसमें सबसे पहले वार्ड क्रमांक 17 में पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता और विभिन्न संगठनों के पदों पर अपनी भूमिका निभाने वाले निलेश मालाकार द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से जिस अंदाज में भाजपा की प्राथमिक सदस्यता तक से इस्तीफा दिया गया है, वह आगे कार्यकर्ताओं के असंतोष को लेकर ऐसी ही कुछ प्रतिक्रियाएं तथा तथा उम्मीदवार के रूप में सूची में घोषित प्रत्याशी का समीकरण बिगाड़ने बनाने की बात को लेकर गंभीरता लिए हुए है। कद्दावर नेता जो भारतीय जनता पार्टी की एकता और शक्ति का प्रदर्शन करते रहते हैं। यह दिखाते हैं। कि पार्टी एक है और यह पार्टी कार्यकर्ताओं की है। किंतु कितना अच्छा होता है । जब जमीनी स्तर का कार्यकर्ता नेता अपने वार्ड में लोगों की समस्या हल करते हुए । लोगों का तालमेल जमाते हुए हर चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के साथ जनता को जोड़ता है। किंतु उसके साथ जो छल होता है ।जब भारतीय जनता पार्टी में भी अब पट्ठा वाद मतलब अपने खास समर्थक को ही टिकट वितरण करना ।चाहे वह योग्य हो या ना हो किंतु अगर वह किसी बड़े लीडर का खास समर्थक है। और उनकी चाटुकारिता में अपना समय हमेशा देता है। तो उसका टिकट हमेशा पक्का हुआ है। और होता रहता है । यह आज से नहीं जब से राजनीति की शुरुआत हुई है ।चाटुकारिता भी पट्ठा वाद के रूप में आज भी लागू है। इसमें सबसे ज्यादा मरण उन कार्यकर्ताओं का होता है ।जो जमीनी स्तर पर जा जाकर घर घर से पार्टी के लिए वोट मांगते हैं ।और अंत में उन्हें जब नेतृत्व के लिए बुलाया कर उनके बदले किसी लीडर का सहयोग ना होते हुए ।वह योग्य होने के उपरांत भी टिकट को प्राप्त नहीं कर पाता ।इसका उदाहरण हमें इस चुनाव में दिख रहा है। नई बात यह भी है ।आरक्षण के हिसाब से कुछ प्रतिनिधित्व ने अपनी पूरी जवाबदारी अपनी पत्नी के नाम में रखते हुए। खुद पार्षद पति बनकर पार्टी में जुड़े रहने का एक अच्छा विकल्प ढूंढ लिया है

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