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भारत के वह महान पुरुष जिन्होंने सिखाया आत्म सम्मान से जीने का तरीका

by Akhbar Jagat , Publish date - Oct 08, 2020 03:29PM IST
भारत के वह महान पुरुष जिन्होंने सिखाया आत्म सम्मान से जीने का तरीका

लेखक- अमित शुक्ला 

 

अख़बार जगत। हम भारतीय है और हमें आत्म सम्मान से जीना बेहद पसंद है और हर व्यक्ति के जीवन में एक ना एक शख्स ऐसा होता है जो हमें आत्म सम्मान से जीना सीखा देता हैं। जो हमरे जीवन का मार्ग दर्शक होता है लेकिन वह शख्स केवल एक ही व्यक्ति के लिए महान बन पाता हैं। लेकिन जब एक ही व्यक्ति पूरी दुनिया को आत्म सम्मान से जीने का सलीका सीखा दे वह पुरे विश्व के लिया महान हो जाता हैं। फिर पूरा विश्व उस व्यक्ति की बताई राह पर  चलने को तैयार हो जाते है।

 ''चिड़ियों से मैं बाज लडाऊं गीदड़ों को मैं शेर बनाऊ सवा लाख से एक लडाऊं तभी गोबिंद सिंह नाम कहाउँ'' यह लेख सिख धर्म के दसवें गुरु के बारे में है। 5 जनवरी 1666 को सिख परिवार में जन्मे सिखों के दसवें गुरु जिन्हे हम एक आध्यात्मिक गुरु , योद्धा, कवि और दार्शनिक मानते थे। जिनके पिता, गुरु तेग बहादुर को इस्लाम में बदलने से मना करने पर सिर कलम कर दिया गया था। जो महज नौ साल की उम्र में सिखों के नेता के रूप में औपचारिक रूप से स्थापित किए गए और जो जन-जन की आस्था और राष्ट्रवीरों और अद्भुत योद्धाओं में शुमार हो गए। जिन्होंने अपने देश के खातिर अपने पुत्रों को कुर्बान कर दिया था। तो आइए जानते है उस महान शख्स के बारे में जिनकी आज पुण्यतिथि हैं।

कैसे बने महज नौ साल की उम्र में सिखों के गुरु

गुरु तेग बहादुर यानि गोबिंद सिंह के पिता जी सिखों के नौ वे धर्म गुरु थे। जब कश्मीरी पण्डितों को ज़बरदस्ती इस्लाम धर्म स्वीकार करने पर मजबूर किया जा रहा था तब गुरु तेगबहादुर जी ने इसका पुरजोर विरोध किया और हिन्दुओं की रक्षा की। उन्होंने खुद भी इस्लाम धर्म कबूल करने से इनकार कर दिया। इस कारण से उन्हे हिन्दुस्तान के बादशाह औरंगज़ेब नें चांदनी चौक विस्तार में उनका सिर कलम करवा दिया। इसी घटना के बाद उनके पुत्र गुरु गोबिंद सिंह सिखों के दसवे गुरु नियुक्त किए गए।
करीब नौ साल के बेटे गोबिंद राय जो बाद में खालसा पंथ की स्थापना के बाद गुरु गोबिंद सिंह कहलाए, उन्होंने खुद पिता को इन शब्दों के साथ शहीदी के लिए प्रेरित किया था कि "इन दिनों आपसे बड़ी महान आत्मा और कौन सी हो सकती है।"

'सवा-सवा लाख पे एक को चढ़ाऊंगा, गुरु गोविंद सिंह निज नाम तब कहाऊंगा।' गुरु गुरु गोविंद सिंह की वीरता और पराक्रम को ये पंक्तियां बहुत ही अच्छी तरह दर्शाती हैं। गुरु गोविंद सिंह एक ऐसे वीर संत थे, जिनकी मिसाल हिंदुस्तान क्या, दुनिया के इतिहास में कम ही मिलती है। इन्होंने मुगलों के जुल्म के आगे कभी भी घुटने नहीं टेके और सिखों को खालसा पंथ में दीक्षित किया।
वह ऐसा दौर था, जब पूरे हिंदुस्तान में सामंती व्यवस्था के खिलाफ लोगों में आक्रोश उभर रहा था। इसकी वजह ये थी कि धर्म के नाम पर आम जनता का बहुत ज्यादा उत्पीड़न होने लगा था। तरह-तरह के कर्मकांडों में उलझाकर गरीब और अशिक्षित जनता को शासकों के साथ-साथ धर्म के ठेकेदार भी लूट रहे थे। इसके विरोध में दक्षिण भारत से लेकर उत्तर भारत तक नई चेतना का जागरण शुरू हुआ, जिसमें महत्वपूर्ण भूमिका गुरु गोबिंद सिंह जी ने तमाम सामाजिक बुराइयों, जैसे छुआछूत, असमानता, जातिवाद आदि के खिलाफ आवाज़ बुलंद किया।
गुरु गोबिंद सिंह जी एक ऐसे संत थे, जिन्होंने मनुष्य मात्र की समानता और एकता पर जोर दिया और हर तरह के भेदभाव के विरुद्ध धर्म की शिक्षा दी। उनके धर्म में जातिवाद के लिए कोई स्थान नहीं था। उनके बाद सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ गुरुग्रंथ साहिब को ही गुरु मान लिया गया।

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