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आडम्बर पर करारा तमाचा जड़ती सीरीज़ आश्रम का रिव्यू

by Akhbar Jagat , Publish date - Aug 31, 2020 10:39PM IST
आडम्बर पर करारा तमाचा जड़ती सीरीज़   आश्रम का  रिव्यू

आश्रम आडम्बर पर करारा तमाचा जड़ती सीरीज़ सीजन - 1 एपीसोड - 9, प्रत्येक एपिसोड 40 से 45 मिंट निर्देशक प्रकाश झा, कहानी हबीब फैसल, सीरीज से पहले चर्चा :- जीवन में एक गुरु का होना जरूरी है, वह गूरू धार्मिक, आध्यात्मिक, शिक्षा, नैतिक मूल्यों को लेकर हो सकता है लेकिन वह गुरू पाखंडी हो तब ??? तो वह गुरू कुशल ज़िन्दगी में काल भी बन सकता है, सीरीज आस्था, शृद्धा, विश्वास के बनते टूटते रिश्तों को लेकर हैं, अंधभक्ति हमेशा घातक सिद्ध हुई है भारतवर्ष में , धर्म कोई भी हो उसमे आडम्बर हमेशा अपराध को इंगित करता है, इस सीरीज में भी यही देखने को मिला, कहानी काशीपुर में एक बाबानिराला (बॉबी देओल) है जो कि ज़ात पात, गरीब अमीर, ऊंच नींच के भाव को मिटाने के लिए साथ ही गरीबो के उद्धार के लिए एक मिसाल कायम किये हुवे है, ज़माने के सताया हो या शारारिक समस्या हो या पोलिस या राजनैतिक, बाबा के पास हर समस्या का हल है, बाबा का रुतबा इस कदर है कि सफेद पोश राजनेता भी उनकी मदद लेकर सत्ता की कुर्सी पर आसित होते है, इस तरह से पूरे प्रदेश की राजनीति या विपक्ष बाबा की उंगलियों की कठपुटली ही लगती है, मुसीबत तब पैदा होती हैं जब बाबा की शक्ति और बुलंदी कुछ लोगो को खटकने लगती है, बाबा निराला जो कि भुत काल मे आपराधिक पृष्ठभूमि रखते थे लेकिन वर्तमान में बाबा ने पुलिस, प्रसाशन, राजनीति में इतनी गहरी जड़े जमा ली है कि उसे उखाड़ पाना लगभग असंभव है, अदिति ओंकार दलित के कुश्ती में हार से शुरू होती है कहानी जिससे स्पष्ट हो जाता हैं कि जातिवाद बड़ा मुद्दा होगा फ़िल्म में, अदिति के भाई की शादी में भाई घोड़े पर सवार होता है और बड़ी ज़ात वाले या बड़े मोहल्ले वाले पिटाई कर देते है, अदिति पोलिस रिपोर्ट करती है,तो बड़े मोहल्ले वाले भाई को इलाज कर रहे हॉस्पिटल के तमाम डॉक्टर्स को बंधक बना कर इलाज रूकवा देते है, यह दबदबा थोड़ा ज्यादा दिखाया गया है क्योकि पोलिस प्रसाशन मूक बधिर बने खड़े रहते है, और पूरा हॉस्पिटल बंधक, यहां बाबा निराला आते है और दलित बच्चे के इलाज के साथ बड़े मोहल्ले के बड़े लोगो का भी इलाज कर देते है, क्या सच मे बाबा भगवान का अवतार है जो कि आमजनों के दुख हरने आए हैं, लड़कियों की गुमशुदगी और बाद में लाशें मिलना क्या बाबा का कोई रिश्ता है, क्या कानून के हाथ सच मे इतने लंबे होते है कि किसी भी अपराधी को कब्र से खोद लाए या पैसा, पॉवर, राजनीति में सच्चाई दम तोड़ देगी इन सवालों के जवाब के लिए आश्रम देखी जा सकती है, पहला सेशन खात्मे के साथ बाबा की असलियत उजागर होने लगी, सीरीज 2 का इंतज़ार करना पड़ेगा, निर्देशकीय :- प्रकाश झा ने बड़ी ईमानदारी से अपना काम किया है वह दर्शको को बांधने में हमेशा से कामयाब रहे है इसमें भी उनकी वही क्षमता दिखी, अश्रम की डिटेलिंग सेवादारों की डिटेलिंग पर संतुलित और सुंदर काम किया है आश्रम का स्थायित्व दॄश्य अच्छा बनाया है, वहां के सेवाकारो को देख कर भी अच्छा लगता है, भीड़भाड़ वाले दृश्यों में प्रकाश झा को महारत हासिल है, आश्रम की गतिविधियों को बड़ी बारीकी से बनाया गया है, जिसमे सम्पूर्णता(डिटेलिंग) दिखती है, प्रकाश कोई न कोई सामाजिक कुरुति पर फ़िल्म बनाते है, गंगाजल, अपहरण, मृत्युदंड, राजनीति, चक्रव्यू, सभी फिल्में किसी न किसी सामाजिक कुरुति पर आधारित रही है, इसमें धर्म की आड़ में आडम्बर को विषय बनाया गया है, लेकिन जातिवाद किसी न किसी रूप में उनकी फिल्मों में बना ही हुवा है, इसमें भी देखने को मिला, अदाकारी :- बॉबी देओल की दूसरी पारी अब कुछ कुछ पटरी पर लग रही है, जिसमे रेस 3, सीरीज क्लास 83, अब आश्रम, अनुप्रिया गोयंका अभीनय में सिद्ध अभिनेत्री है, चंदन राय सान्याल बाबा के खास गुर्गे के किरदार में न्याय करते दिखे, दर्शन कुमार दिल्ली के है ने इंस्पेक्टर उजागर के किरदार से न्याय किया, इन सब के बीच तुषार पांडे भी बढ़िया अभीनय दिखा गए है, विक्रम कोचर ने कांस्टेबल के किरदार को जीवंत बना दिया, अंत मे सीरीज के ट्रेलर में ही स्पष्ट हो गया था कि उद्देश्य धर्म गुरु को गलत इंगित करना या दर्शाना नही है, वरन धर्म की आड़ में बेशर्मी का जो चोला पहना जाता है उस और ध्यान आकर्षित करना है, फ़िल्म समीक्षक इदरीस खत्री

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